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नीलेश रघुवंशी की कविता में नई खिड़कियाँ खुल रही हैं।

‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!

इस आपदा ने अनायास ही लोगों के मन से सागर के प्रति जिज्ञासा बढा दी । सागर की उत्पत्ति, उसका विकास, उसके विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने की आवश्यकता बढ़ गई और बढ़ती आबादी के मद्देनज़र भविष्य में सागर स्थित जैविक व अजैविक संपदा के दोहन और सागा में छिपी प्रचंड ऊर्जा के उपयोग की संभावनाओं की तलाश अनिवार्य हो गई है ।

---डॉ० वीरेंद्र शर्मा, भारतीय विदेश सेवा ( अव०), पूर्व राजदूत

वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द औरसंवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।

The well known Astrophysicist and science writer Jayant V. Narlikar supplies During this substantial operate very well believed out Thoughts in numerous daily life and do the job-parts for us to choose up in right earnest and do the needful to construct up the country together with our own lives.

बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"

रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी  ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।

मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है

अचानक, सदगुरु भगवान दत्त के शरीर से एक तेजस्वी प्रकाश पुंज निकलकर पुनीताचारी जी के शरीर में समा गया । भगवान दत्तात्रेय ने अपना तेज, अपना ओज, अपनी आभा पुनीताचारी जी में प्रविष्ट कराकर पुनीताचारी जी को अपने समान ओजस्वी बना लिया । आज एक गुरु ने अपने शिष्य को सम आसन पर बैठा लिया । बारंबार नमनीय हैं ऐसे सदगुरु भगवान दतात्रेय महाराज और धन्य हैं ऐसे शिष्य पुनीताचारी जी महाराज ।

हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।

इन कहानियों का फलक विस्तृत है। एक ओर वे एक अराजक समय की चपेट में आए व्यक्ति के अंतद्र्वंद्व और मनोविज्ञान को वैयक्तिक स्पर्श के साथ उकेरते हैं, तो वहीं दूसरी ओर बाह्य विडंबनाओं को भी प्रतीकात्मक तथा सृजनात्मक ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करते हैं। मानवीय मूल्यों को खंगालते हुए वे कभी वर्तमान के परिदृश्य को पकड़ते हैं, तो कभी सदियों के आर-पार इतिहास के पन्नों तक पहुंच जाते हैं।

गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।

'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके क्राव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें more info हम दख सकते है । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढने की गंभीर कोशिश दिखाई देती हे ।

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